Sunday, July 12, 2009

सादा जीवन के हिमायती थे थोरो

नई दिल्ली। हेनरी डेविड थोरो अमेरिका के पहले ऐसे विचारक थे, जिन्होंने अमेरिका में 'सादा जीवन, उच्च विचार' की कल्पना को देशवासियों के बीच पहुंचाने का प्रयास किया। अपने पूरे जीवनकाल के दौरान उन्होंने पश्चिमी देशों के निवासियों को विलासिता के साधनों, मांसाहार और आधुनिकता से परे होकर विचारों की शुद्धता और जीवन को साधारण बनाने के लिए प्रेरित किया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महानायक महात्मा गांधी के जीवन और विचारों पर जिन चंद लोगों का जबरदस्त प्रभाव था, उनमें अमेरिकी लेखक और विचारक थोरो भी शामिल थे तथा उनकी कृतियों के कारण बापू को सादगी भरे जीवन का सूत्र मिला। उनके जन्मदिवस 12 जुलाई को पूरी दुनिया में 'सिंपलिसिटी दिवस' के रूप में मनाया जाता है। महात्मा गांधी ने 1902 में जोहांसबर्ग में अमेरिकी पत्रकार वैब मिलर से कहा था कि दक्षिण अफ्रीका में मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में काम करने के दौरान उन्होंने अमेरिकी लेखक और विचारक हेनरी डेविड थोरो की 'वाल्डेन' को पढ़ा जिसके बाद उन्हें उनके सादा जीवन के विचारों से बहुत प्रेरणा मिली। उन्होंने कहा था कि वह भारत की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने के दौरान इनका पालन करेंगे और उनके जो साथी इस काम में सहयोग कर रहे हैं, उन्हें भी थोरो को पढ़ने को कहेंगे। महात्मा गांधी से जुड़ी रहीं स्वतंत्रता सेनानी रुक्मिणी दास ने बताया कि महात्मा गांधी देश-दुनिया के उन सभी लेखकों को पढ़ते थे, जिनके विचार उनसे मिलते-जुलते थे। रुक्मिणी ने बताया कि उनके पास पश्चिमी लेखकों की पुस्तकों का बहुत बड़ा संग्रह था, जिनसे वे जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी चीजों की प्रेरणा लेते थे। थोरो के आदर्शो पर चलने वालों में महात्मा गांधी के अलावा मार्टिन लूथर किंग जूनियर का भी नाम है। मार्टिन ने अपनी आत्मकथा में इस बात का उल्लेख किया है कि उन्हें अहिंसा के रास्ते से विरोध करने का विचार 1944 में थोरो को पढ़ने के बाद आया। थोरो ने लगभग 250 वर्ष पूर्व भविष्य के भागदौड़ भरे जीवन की कल्पना करते हुए जीवन को साधारण बनाने और प्रकृति के करीब रखने की जरूरत पर बल दिया था। उन्होंने कई किताबें लिखीं, जिनमें 'वाल्डेन' और 'ऑन सिविल ओबीडियंस' सबसे ज्यादा चर्चित हैं।

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